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नई दिल्ली, 20 दिसंबर, 2015, "संगीत सम्मान अवार्ड" "ट्रेडिशन्स 2015" "अखिल भारतीय प्रतिभा पुरस्कार" एवं "दिल्ली प्रतिभा पुरस्कार" के अवसर पर मेरे भाषण के मुख्य अंश

"संस्कृति और साहित्य के सिपाहियों" पर “स्वार्थी सियासत का साया” ठीक नहीं, कला और कलम को देश में बिखराव-टकराव का हिस्सा नहीं बल्कि शान्ति, सौहार्द, समृद्धि का हथियार बनाने की जरुरत है।

समाज के बौद्धिक वर्ग के लोग, साहित्यकार, कलाकार देश की विकास की धारा को आगे बढ़ाने में मददगार बनें। अगर ये बुद्धिजीवी किसी दुष्प्रचार का हिस्सा बन कर , जाने-अनजाने किसी भी नकारात्मक एजेंडे से प्रभावित हो कर देश के विकास की धारा को रोकने के प्रयासों का हिस्सा बनते हैं तो ये देश की छवि को तो प्रभावित करेगा ही साथ ही साथ उनको उनकी उपलब्धियों के लिए दिए गए सम्मान की छवि पर भी असर डालेगा। "कला-कलम का सियासी सौदा सांस्कृतिक सम्मान का अपमान है।"

लेखक, साहित्यकार और कलाकार चाहे वो किसी भी क्षेत्र से हों, समाज का वो बौद्धिक वर्ग है जो समाज को एक नई दिशा देने का काम करता है, अपनी कला, अपनी कलम से समाज को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। भारत के अनेकों लेखकों, साहित्यकारों और कलाकारों ने राष्ट्र निर्माण और समाज सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कलाकार और साहित्यकार सम्मान या पहचान हासिल करने के उद्देश्य से अपना काम नहीं करते हैं बल्कि वो तो अपनी कला, अपनी कलम, अपनी क्षमता का इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण के लिए करते हैं। लेकिन किसी सरकार या किसी अन्य संस्था द्वारा किसी साहित्यकार या कलाकार को सम्मान दिया जाना उसकी कला को मान्यता देना, उसे सम्मानित करना है। उसके समाज को सकरात्मक सन्देश के मिशन को ताकत देता है। साहित्यकारों-कलाकारों को सम्मान समाज में उनके योगदान के लिए ही दिया जाता है। ऐसे में इन साहित्यकारों-कलाकारों को उनको दिए जाने वाले सम्मान की प्रतिष्ठा का ध्यान रखना चाहिए।

पिछले दिनों देश में जो कुछ देखने को मिला, वह दुर्भाग्यपूर्ण था। कुछ साहित्यकारों-कलाकारों ने तथाकथित असहिष्णुता के नाम पर अपने सम्मान वापस किए। ये "सम्मान वापसी अभियान" पूरी तरह से "फैब्रिकेटेड पोलिटिकल प्रोपेगंडा" था जो भाजपा विरोधी राजनैतिक दलों और उनके सहयोगियों ने बिहार चुनाव के लिए चलाया था। बिहार चुनाव ख़त्म होते ही "अवार्ड वापसी अभियान" भी ख़त्म हो गया।

अब ये साफ हो चूका है कि पिछले दिनों का "अवार्ड वापसी अभियान" पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित था। ये गांव-गरीब-किसान-अल्पसंख्यकों के विकास को समर्पित मोदी सरकार के खिलाफ नकारात्मक एजेंडे का हिस्सा था ताकि देश की तरक्की की राह को बाधित किया जा सके। सहिष्णुता-असहिष्णुता के मुद्दे पर विरोध करने वालों को यह समझना चाहिए सहिष्णुता, भाईचारा, सौहार्द, सद्भाव भारत और यहाँ के लोगों के “डीएनए” में है। उसे कोई भी ख़त्म नहीं कर सकता।

 असहिष्णुता का भयानक रूप हमें सीरिया, पाकिस्तान और अन्य देशों में देखने को मिल रहा है जहाँ मासूम बच्चो, नमाज पढ़ते हुए लोगों को गोलियों से भूना जा रहा है, लोगों को कैमरे के सामने गला काट कर मौत के घाट उतारा जा रहा है, स्कूल के मासूम बच्चों का कत्लेआम हो रहा है । भारत में असहिष्णुता का मुद्दा उठाने वालों से मैं ये पूछना चाहता हूँ की उन्हें भारत में कहाँ इस तरह की घटना दिखाई दे रही है। पिछले साल मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद कहीं भी सांप्रदायिक तनाव-उन्माद सफल नहीं हो पाया।

जो कुछ दादरी में हुआ, कर्नाटक में हुआ या फरीदाबाद में हुआ, वो किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इन अफसोसजनक घृणित घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा की। लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने इन घटनाओं का राजनीतिकरण किया और समाज के बिखराव-टकराव का वातावरण बनाने की कोशिश की।

 हमारी अपील है कि समाज के प्रबुद्ध लोग, साहित्यकार, कलाकार देश की विकास की धारा को आगे बढ़ाने में मददगार बने। समाज में किसी भी प्रकार की नकारात्मक सोच को पनपने से रोकने में सहयोग दें। वो राष्ट्र हित में अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करें। यदि राष्ट्र विरोधी ताकतों की चालों से देश को बचाना है तो समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा। इस दिशा में कवियों, लेखकों, कलाकारों, साहित्यकारों के प्रयास अहम हैं।