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30 सितम्बर, 2015 को विशाखापट्नम में 17वें अखिल भारतीय सचेतक सम्मलेन के दौरान मेरा समापन भाषण :

आप सभी को नमस्कार और यहाँ विशाखापट्नम में 17वें अखिल भारतीय सचेतक सम्मलेन में आने के लिए आप सभी का शुक्रिया। मुझे 17वें अखिल भारतीय सचेतक सम्मलेन में आप सभी को सम्बोधित करते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है। मित्रों, बदले हुए राजनैतिक माहौल में राज्यसभा-विधानपरिषदों की भूमिका को रि-डिफाइन (re-define) करने की जरुरत है। कभी-कभी जनादेश मिलने के बावजूद भी सरकारें और सदन राजनैतिक कारणों से देश और लोगों के सरोकार से जुड़े हुए कानून नहीं पास करा पाते हैं। जिस समय संविधान निर्माताओं ने दोनों सदनों के अधिकारों-कर्तव्यों की कल्पना की थी, उस समय ऐसी राजनैतिक परिस्थितियों का अंदेशा ना रहा हो। आज लोग 80 प्रतिशत, 90 प्रतिशत मतदान कर यह अपेक्षा करते हैं कि सदन और सरकारें जनादेश का सम्मान और जन अपेक्षाओं पर खरी उतरेंगी। पर कभी-कभी जन सरोकार सियासत की सूली चढ़ जाता है और सरकारें व्यवस्था की बंधन बन जाती हैं। राज्यों में यह संकट कम देखने को मिलता है पर केंद्र को अक्सर इस तरह के संकट का सामना करना पड़ता है। मित्रों, पर मुझे ख़ुशी है क़ि भारतीय संसदीय लोकतंत्र ना केवल भारत बल्कि दुनिया की सबसे मजबूत संवैधानिक व्यवस्था है, 6 दशकों से ज्यादा समय से विभिन्न कमियों, कमजोरियों के बावजूद भारत का संसदीय लोकतंत्र मजबूत और प्रभावी हुआ है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक संसद, विधानसभाओं और अन्य चुनावों में लोगों की बढ़-चढ़ कर भागीदारी भारत के लोगों की संसदीय लोकतंत्र के प्रति अटूट आस्था और विश्वास का प्रमाण है। हमारे कन्धों पर लोगों की आस्था और विश्वास को मजबूत करने,बनाये रखने की बड़ी जिम्मेदारी है। लोकतान्त्रिक, संवैधानिक, संसदीय मूल्यों की रक्षा हमारा धर्म है। इस सम्मलेन में यहाँ उपस्थित गणमान्य लोगों ने भारतीय संसदीय प्रजातंत्र से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर विस्तृत रूप से चर्चा की। संसदीय प्रजातंत्र जन सरोकार के इर्द गिर्द केंद्रित रहता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा संसदीय प्रजातंत्र है। भारत की संसदीय व्यवस्था दुनिया के सभी लोकतान्त्रिक देशों को प्रेरणा देती रही है। इस सम्मलेन ने जिन मुख्य बिन्दुओं पर चर्चा की उनमें 16वे अखिल भारतीय सचेतक सम्मलेन की सिफारिशों की समीक्षा, संसद सदस्यों और राज्यों के विधायकों के वेतन भत्ते से सम्बंधित स्थायी तंत्र की आवश्यकता, सदनों के कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए और समस्यातमक विषयों का समाधान करने के लिए संसद और राज्य विधानमंडलों में अन्तर्दलीय मंचो की स्थापना, और MPLAD योजना शामिल रहे। मित्रों, भारतीय संसदीय प्रजातंत्र में संसद और राज्यों के विधानमंडल को प्रजातंत्र का सर्वोच्च मंदिर माना जाता है, और यह पवित्र संस्थाएं आम जनता के हितों की संरक्षक हैं, आम लोगों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने, उनके समाधान का सबसे असरदार संवैधानिक मंच हैं। दुर्भाग्य से संसद और राज्यों के विधानमंडल को लेकर आम लोगों के बीच बढ़ रही नकारात्मक भावना चिंता का विषय है, एक ऐसी सोच बन गई है कि आम लोग संसद और राज्य विधानमंडलों के काम काज से खुश नहीं हैं, बेवजह के हंगामे से हम राजनीतिज्ञों को लेकर लोगों के मन में एक प्रकार की निराशा का माहौल बनता है। भारत की संसदीय व्यवस्था में विपक्ष की भी अहम भूमिका होती है, विपक्ष की आवाज सरकार द्वारा अवश्य सुनी जानी चाहिए। विपक्ष के साथ समन्वय, संवाद, सामंजस्य किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है। डिस्कशन, डिबेट और डिस्टर्बेंस संसदीय व्यवस्था का भाग हैं,विपक्ष एक सजग प्रहरी की तरह है जो सरकार पर कड़ी नजर रखता है ताकि सरकार लोगों के हितों की अवहेलना ना कर सके। सरकार द्वारा आम जनता के हितों को नजरअंदाज किये जाने पर विपक्ष को अपनी आवाज उठाने का पूरा हक है। लेकिन हंगामा मुद्दों पर आधारित होना चाहिए, विपक्ष को एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए ना कि अवरोधकारी विपक्ष की। सदनों में राजनैतिक पूर्वाग्रह से देश-प्रदेश की तरक्की, जनसरोकार के सवालों को सियासत की सूली पर नहीं चढ़ने देना चाहिए। आधारहीन मुद्दों पर हंगामा न केवल संसद और राज्यों के विधानमंडलों की साख पर प्रभाव डालता है बल्कि इससे जनता का पैसा भी बर्बाद होता है। इस स्थिति से बचने की जरुरत है। संसद के पिछले मानसून सत्र के दौरान हमने देखा कि आधारहीन हंगामे से देश की आर्थिक प्रगति से जुड़े कुछ अत्यंत जरुरी बिल पारित नहीं किये जा सके। पिछले मानसून सत्र के दौरान हंगामे के कारण राज्यसभा के लगभग 77 घंटे बर्बाद हुए जबकि लोकसभा के 34 से ज्यादा घंटे बर्बाद हुए। गुड्स और सर्विसेज टैक्स (GST) देश की तरक्की के लिए आवश्यक है, इससे देश की आर्थिक विकास दर में 1 से 2 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है लेकिन इस विधेयक के पारित होने में हो रही देरी से देश की अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष हजारों करोड़ का नुक्सान हो रहा है। इस सन्दर्भ में मैं सभी राजनैतिक दलों से अपील करता हूँ की वो नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा शुरू किये गए सुधारात्मक प्रयासों का सहयोग कर देश के विकास में भागीदार बने। हमें यह समझना होगा कि देश की जनता हमें इसलिए चुन कर संसद या विधानमंडलों में भेजती है ताकि हम "विकास की रोड बनें, रोड़ा न बनें।" यह भी जरुरी है कि हर हालत में जनमत का सम्मान किया जाना चाहिए। आम जनता के हितों से जुड़े मुद्दों को सियासत की सूली नहीं चढ़ने देना चाहिए। हमें साथ मिल कर काम करना होगा ताकि संसद और विधानमंडलों के बहुमूल्य समय का सदुपयोग किया जा सके और आवश्यक विधेयकों को पारित किया जा सके, जनसरोकार से जुड़े सवालों पर सकारात्मक चर्चा की जा सके, हमें संसद और राज्यों के विधानमंडलों की अधिक से अधिक बैठकें सुनिश्चित करनी होंगी। हमारी केंद्र की सरकार इस दिशा में काम कर रही है। 2014 में हमारी सरकार के बनने के बाद लगभग सभी संसद सत्रों में उच्च उत्पादकता प्राप्त की गई थी। संसद-विधानसभाओं का हर मिनट देश और लोगों के सरोकार को समर्पित होना चाहिए। संसद और विधानमंडलों में कभी-कभी कुछ सदस्यों का अशोभनीय,गैर जिम्मेदाराना व्यव्हार भी चिंता का विषय है। सदस्यों के अशोभनीय व्यवहार से न केवल संसद या विधानमंडलों का काम काज प्रभावित होता है बल्कि इन संस्थाओं की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है। अब समय आ गया है हम इन विषयों पर गहन चिंतन करें। हमारे बीच वैचारिक, सैद्धांतिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन इन मतभेदों को देश की तरक्की के रास्ते में रोड़ा बनने से रोकना हम सभी की जिम्मेदारी है। वैचारिक, सैद्धांतिक मतभेदों को राजनैतिक मनभेद में नहीं बदलना चाहिए। इस परिस्थिति में मुख्य सचेतकों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है। सदन के भीतर दलों की व्यवस्था के सफल और निर्विघ्न कार्य संचालन में सचेतकों की महत्वपूर्ण भूमिका है, सदन में सरकारी कार्य का आयोजन, मॉनिटरिंग और प्रबंध का दायित्व सरकारी मुख्य सचेतक और अन्य दलों के सचेतकों पर निर्भर करता है। दलों के सचेतक अपने-अपने दलों के सदस्यों की उपस्थिति, विशेष रूप से महत्वपूर्ण चर्चा और मतदान के दौरान, सदस्यों का आचरण सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। मित्रों, संसद और विधानमंडलों की कार्यवाही, सदस्यों के आचरण,सदन की प्रतिष्ठा को बनाये रखने को लेकर सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने का समय आ गया है ताकि सदनों की अधिक से अधिक बैठक,सदनों की विश्वनीयता को बरक़रार रखा जा सके। मैं आप सभी को भरोसा दिलाता हूँ कि हमारी सरकार इसके लिए समर्पित है। मित्रों, संसद और विधानमंडलों के सदस्यों के वेतन-भत्ते का विषय हमेशा से ही जनता के बीच रूचि का विषय रहा है, यह मीडिया के लिए भी सबसे पसंदीदा विषयों में से एक रहा है। राजनीतिज्ञों की इस विषय को लेकर कई बार आलोचना भी की जाती रही है। इसलिए संसद एवं राज्यों के विधानमंडलों के सदस्यों के वेतन-भत्ते निर्धारित करते समय जन भावना का भी पूरा-पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए। इस अखिल भारतीय मुख्य सचेतक सम्मलेन की कार्यसूची की तीसरी मद जिस पर हमने चर्चा की वह थी सदनों का सुचारू कार्यचालन सुनिश्चित करना और विवादास्पद मुद्दों को हल करने के लिए संसद और राज्य विधानमंडलों में एक अंतर दलीय मंच स्थापित करने की आवश्यकता। मेरे विचार से विधानमंडलों का कार्य सुचारू रूप से न चलने के कारणों में से एक कारण महत्वपूर्ण मुद्दों पर विभिन्न राजनीतिक दलों में राजनीतिक और वैचारिक मतभेद हो सकता है। यदि कोई तंत्र विकसित किया जाता है जैसे कि अंतर दलीय मंच की स्थापना, तो ऐसा मंच मतभेद दूर करके विवादास्पद मुद्दों को हल करते हुए सुचारू कार्यचालन के संबंध में आम सहमति पर पहुंचने में मदद कर सकता है। यह विधानमंडलों के सुचारू कार्यचालन में हमारी काफी हद तक सहायता करेगा। इस सम्मलेन के दौरान एमपीलैड MPLAD योजना पर भी चर्चा हुई। यह योजना संसद सदस्यों द्वारा उनके क्षेत्रों में विभिन्न विकास कार्य कराने में लाभदायक रही है। इस योजना से संसद सदस्यों के अपने अपने क्षेत्रो में विभिन्न विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिली है जैसे पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराना, शिक्षा, स्वस्थ्य, बिजली, सड़क की सुविधा उपलब्ध कराना। ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है ताकि सभी संसद एवं विधानमंडलों के सदस्य अपने फण्ड का अधिकतम उपयोग कर सके। कई सांसदों ने उन्हें दिए जाने वाले सालाना 5 करोड़ के फण्ड को बढ़ाने की मांग की है, इस विषय पर चर्चा की जानी चाहिए। मैं आशा करता हूं कि इस सम्मेलन की सिफारिशें विभिन्न विधायिकाओं और राज्य सरकारों द्वारा स्वीकार की जाएंगी और वे इनकी जाँच करेंगे और इन्हें लागू भी करेंगे। एक बार फिर मैं आप सभी का इस सम्मेंलन के आयोजन में अपना सहयोग और समर्थन देने के लिए शुक्रिया अदा करता हूं ।