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जयपुर, 05 मार्च, 2016:जयपुर में राजस्थान पत्रिका के “KEYNOTE IDEA FEST 2016” के अवसर पर मेरे संबोधन के मुख्य अंश की प्रेस विज्ञप्ति:

 केंद्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक मामलों के राज्यमंत्री श्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने आज यहाँ कहा कि भारत के प्रजातंत्र की सबसे असरदार संवैधानिक संस्था संसद का उपयोग जन सरोकार के उद्देश्य से किया जाना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से कभी-कभी संसद में "डेस्ट्रक्टिव एजेंडा", "लेजिस्लेटिव एजेंडे" पर हावी हो जाता है।

राजस्थान पत्रिका के “KEYNOTE IDEA FEST 2016” के अवसर पर जयपुर में श्री नक़वी ने कहा कि "लेजिस्लेटिव एजेंडे" पर "डेस्ट्रक्टिव एजेंडे" के हावी होने से "डेवलपमेंट एजेंडा" प्रभावित हो रहा है।

श्री नक़वी ने कहा कि संसद में कांग्रेस द्वारा आधारहीन हंगामे का मुख्य कारण ये है कि कांग्रेस दो साल बाद भी सत्ता का बदलाव हजम नहीं कर पायी है। श्री नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना कांग्रेस की “आँख की किरकिरी” बना हुआ है। "सामंती मानसिकता" वाले लोग सत्ता को किसी खास परिवार का अधिकार मानते हैं या फिर उसे "रिमोट" द्वारा चलाना चाहते हैं।

श्री नक़वी ने कहा कि जब एनडीए सरकार सत्ता में आई तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी भ्रष्टाचार और घोटाला मुक्त साफ-सुथरी और पारदर्शी व्यवस्था देना। एनडीए सरकार इस चुनौती पर खरी उतरी है। मोदी सरकार ने सत्ता के गलियारों से “सत्ता के दलालों की नाकाबंदी” और “लूट लॉबी की तालाबंदी” कर दी है जिससे सरकार का पैसा सही मायनों में जनता के विकास पर खर्च हो रहा है।

श्री नक़वी ने कहा कि लेकिन मोदी सरकार द्वारा “सत्ता के दलालों की नाकाबंदी” और “लूट लॉबी की तालाबंदी” उन लोगों को हजम नहीं हुई है जो जन धन की लूट को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। यही लोग मोदी सरकार को बदनाम कर देश के विकास में रोड़ा अटकाने का नया-नया हथकंडा अपनाते हैं।

श्री नक़वी ने कहा कि किसी भी संसदीय प्रजातंत्र में देश के जनादेश का हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से अभी हम देख रहे हैं कि राजनीतिक स्वार्थ, देश की तरक्की के रास्ते में बड़ा रोड़ा बन कर खड़ा हो गया है। विकास और गरीबों के सशक्तिकरण से जुड़े कानून रोक दिए गए हैं।

श्री नक़वी ने कहा कि संसद के पिछले दो सत्र- "मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र"- को देश के विकास और जन सरोकार से जुड़े हुए मुद्दों के नुक्सान का सत्र कहा जा सकता है क्योंकि इन सत्रों में बेवजह के हंगामे के कारण जनता का पैसा तो बर्बाद हुआ ही साथ ही कई महत्वपूर्ण बिल जैसे- रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) संशोधन विधेयक, 2013; एंटी-हाईजैकिंग बिल, 2014 और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पारित नहीं हो पा रहे हैं जबकि यह विधेयक जनता और देश की समृद्धि से जुड़े "रिफार्म बिल" हैं।

संसद के मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र के दौरान जहाँ राज्यसभा के बहुमूल्य लगभग130 घंटे और 9 मिनट बर्बाद हुए वहीँ लोकसभा के लगभग43 घंटे बर्बाद हुए। दोनों सत्रों को मिलाकर, राज्यसभा में हंगामे के कारण जनता के लगभग 143.36 करोड़ और लोकसभा में हंगामे के कारण लगभग64.03करोड़ रूपए बर्बाद हुए।

श्री नक़वी ने कहा कि यही स्थिति कमोबेश इस बजट सत्र में भी दिखाई पड़ रही है। विपक्ष,विशेषकर कांग्रेस देश के विकास के मुद्दों को रोकने का हर प्रयास कर रही है। हमें इस पर गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि जन आकाँक्षाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी सांसदों, विधयकों सहित सभी जन प्रतिनिधिओं की है। वर्तमान में जहाँ संसद सदस्यों की संख्या 790 है वहीँ राज्यों की विधानसभाओं और विधान परिषदों की सदस्यों की संख्या लगभग 4580 हैं। भारत में आज लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास और बढ़ा है। पर संसद और विधानसभाओं में हंगामा, हुड़दंग लोगों को निराश करता है।

श्री नक़वी ने कहा कि हाल के समय में सरकारों, विभिन्न सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं, मीडिया और विशेष रूप से चुनाव आयोग के अभियानों से जनता में चुनाव और जन प्रतिनिधियों की जिम्मेदारियों को लेकर काफी जागरूकता आई है। 2014 के लोक सभा चुनाव और उसके बाद हुए कई विधानसभाओं और अन्य निकायों के चुनावों में जनता ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। और नकारात्मक राजनीति को खारिज किया और सकारात्मक-विकासात्मक राजनीति को चुना है।

पिछले लोकसभा चुनाव में 66.44 प्रतिशत मतदान दिया हुआ जो 2009 के चुनाव में 58.19; 2004 में 57.65 और 1998 में 61.97 प्रतिशत था। इससे साफ जाहिर होता है कि प्रजातंत्र से जुड़े संस्थाओं- संसद, विधानसभाओं से लोगो की उम्मीदें, आकांक्षाएं बहुत बढ़ गई हैं।यह भारत के प्रजातंत्र के लिए अच्छा संकेत है। साथ ही जन आकांक्षाएं राजनैतिक दलों, राजनेताओं, संसद, विधानसभाओं, अन्य निकायों, जन प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी बढ़ गई है।

श्री नक़वी ने कहा कि जनता अब जन प्रतिनिधियों से अपने वोट का पूरे सूद ब्याज के साथ हिसाब चाहती है। बढ़ती हुई जन आकांक्षाओं का ही नतीजा है कि जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतरने वाले दल या संसद और विधानसभा सदस्य को जनता अगले चुनाव में बुरी तरह नकार देती है। अप्रैल-मई2014 में संपन्न हुए पिछले लोकसभा चुनाव में कुल 315 सदस्य ऐसे थे जो 543 सदस्यीय लोकसभा में पहली बार चुन कर आए यानि सदन का लगभग 58प्रतिशत। इसका मतलब है कि लगभग 42 प्रतिशत सदस्यों को जनता ने दोबारा मौका नहीं दिया। पहली बार लोकसभा में आने वाले सदस्यों की संख्या2009 में 302 थी।
अक्टूबर-नवम्बर में हुए 242 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा के चुनाव में लगभग 41 प्रतिशत विधायक पहली बार विधानसभा के सदस्य बनें। फरवरी 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगभग 70 प्रतिशत सदस्य पहली बार विधायक बनें थे। इन चुनावों में हारने वालों में से कई सदस्यों ने अच्छा काम किया हो लेकिन शायद वो जनता की कसौटी पर खरा नहीं उतर सके। यह जनता की सोच-समझ दिखाता है जिसका कभी भी कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता।

श्री नक़वी ने कहा कि इसलिए यह हम राजनेताओं की जिम्मेदारी है कि हम जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की ईमानदारी कोशिश करें। संसद और विधानसभाओं के बहुमूल्य समय का सदुपयोग भी इसी प्रयास का एक हिस्सा है।

श्री नक़वी ने कहा कि किसी भी प्रजातंत्र को मजबूत रखने के लिए उसकी संवैधानिक तथा अन्य संस्थाओं को मजबूत रखना और उनकी स्वायत्ता बरकरार रखना जरुरी है।

श्री नक़वी ने कहा कि कांग्रेस द्वारा सरकारी एजेंसियों विशेषकर CBI का दुरूपयोग किया गया। इशरत जहाँ के मामले में हाल ही में सामने आये खुलासों से यह साबित हुआ है कि तत्कालीन सरकार ने किस तरह इस जांच एजेंसी का दुरूपयोग राजनीतिक हित साधने और श्री नरेंद्र मोदी और कुछ अन्य वरिष्ठ भाजपा नेताओं को आपराधिक साजिश के तहत बदनाम करने का ताना-बाना बुनने के लिए किया गया था। इन खुलासों से राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सियासत करने वाले सूरमाओं के "पॉलिटिकल पाखण्ड" का पर्दाफाश हुआ है।

श्री नक़वी ने कहा कि यह शर्मनाक उदाहरण है कि अपने राजनीतिक विरोधी के खिलाफ इतनी घृणित "क्रिमनल कांस्प्रेसी" की जाये, ऐसी "क्रिमनल कांस्प्रेसी के क्लस्टर की कैप्टन" का चेहरा बेनकाब हो चुका है।