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लखनऊ में 17 जनवरी, 2020 को आयोजित राष्ट्र मंडल संसदीय संघ भारत क्षेत्र के सातवें सम्मेलन के दौरान 'जन प्रतिनिधियों का ध्यान विधायी कार्यों की ओर बढ़ाना' विषय पर मेरे भाषण की प्रेस विज्ञप्ति:

केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री श्री मुख्तार अब्बास नकवी ने आज यहाँ कहा कि हमारा संवैधानिक संघीय ढांचा "अनेकता में एकता" की गारंटी है।
आज विधान भवन, लखनऊ में आयोजित राष्ट्र मंडल संसदीय संघ भारत क्षेत्र के सातवें सम्मेलन के दौरान 'जन प्रतिनिधियों का ध्यान विधायी कार्यों की ओर बढ़ाना' विषय पर अपने सम्बोधन में श्री नकवी ने कहा कि हमारे संविधान में जहाँ संविधान संसद, विधानमंडल के "पावर और प्रिविलेज" को आर्टिकल 105 में स्पष्ट करते हैं वहीँ उससे पहले आर्टिकल 51 A मूल कर्तव्यों की भी जिम्मेदारी देता है। आर्टिकल 105 में संसद के सदनों और उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार आदि स्पष्ट किये गए हैं-
(1) इस संविधान के उपबंधों और संसद की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों और स्थायी आदेशों के अधीन रहते हुए, संसद में वाक्-स्वातंत्र्य होगा।
(2) संसद में या उसकी किसी समिति में संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरूद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी और किसी व्यक्ति के विरूद्ध संसद के किसी सदन के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी प्रतिवेदन, पत्र, मतों या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में इस प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
(3) अन्य बातों में संसद के प्रत्येक सदन की और प्रत्येक सदन के सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ ऐसी होंगी जो संसद, समय-समय पर, विधि द्वारा,परिनिश्चित करे और जब तक वे इस प्रकार परिनिश्चित नहीं की जाती हैं तब तक वही होंगी जो संविधान (चवालीसवाँ संशोधन)अधिनियम, 1978 की धारा 15 के प्रवृत्त होने से ठीक पहले उस सदन की और उसके सदस्यों और समितियों की थीं।
(4) जिन व्यक्तियों को इस संविधान के आधार पर संसद के किसी सदन या उसकी किसी समिति में बोलने का और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार है, उनके संबंध में खंड (1), खंड (2) और खंड (3) के उपबंध उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे संसद के सदस्यों के संबंध में लागू होते हैं। लगभग यही व्यवस्था विधानमंडलों में भी है।
श्री नकवी ने कहा कि वहीँ भारतीय संविधान ने मूल कर्तव्यों के प्रति भी जिम्मेदारी तय की है। संविधान के अनुच्छेद 51 A में स्पष्ट कहा है कि- भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह—
(क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे;
(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्र्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे;
(ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे;
(घ) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;
(ङ) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है;
(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे;
(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे;
(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;
(झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;
(ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले;
(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करे।
श्री नकवी ने कहा कि जिस तरह से मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में हम जागरूक रहते हैं उसी तरह से मूल कर्तव्यों के प्रति भी हमें जिम्मेदारी समझनी होगी। नागरिकों के मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्यों के निर्वहन पर आधारित हैं, क्योंकि अधिकार और कर्तव्य दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते। नागरिकों द्वारा राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।
श्री नकवी ने कहा कि जीवन, स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित मौलिक अधिकारों को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन नागरिकों जिनमे चुने प्रतिनिधि शामिल हैं, द्वारा राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को गंभीरता से लेने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि कर्तव्यों और जिम्मेदारियों दोनों से पात्रता आती है। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य का पालन करता है, तो अधिकारों का उपयोग करने के लिए उचित माहौल बनेगा। उन्होंने जनप्रतिनिधियों से कहा कि कर्त्तव्य के प्रति ईमानदारी की नजीर बनना चाहिए।
श्री नकवी ने कहा कि भारत न केवल सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में उभरा है, बल्कि जीवंत, बहुल संस्कृति, संसदीय प्रणाली के रूप में फला-फूला और मजबूत हुआ है, जिसमें संविधान प्रत्येक समाज के अधिकारों की रक्षा करता है।
श्री नकवी ने कहा कि नागरिकों के अधिकार और मूल कर्त्तव्य समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। नागरिक अधिकार और दायित्व, एक ही सिक्के के दो पहलु है और दोनों ही साथ-साथ चलते हैं। यदि हम अधिकार रखते हैं, तो हम उन अधिकारों से जुड़ें हुए कुछ दायित्व भी रखते हैं। जहाँ भी हम रह रहें हैं, चाहे वह घर, समाज, गाँव, राज्य या देश ही क्यों न हो, वहाँ अधिकार और दायित्व हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं।
श्री नकवी ने कहा कि देश का अच्छा नागरिक होने के रुप में, हमें समाज और देश के कल्याण के लिए अपने अधिकारों और कर्तव्यों को जानने, सीखने और अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है।
यदि वैयक्तिक कार्यों के द्वारा जीवन को बदला जा सकता है, तो फिर समाज में किए गए सामूहिक प्रयास देश व पूरे समाज में सकारात्मक प्रभाव क्यों नहीं ला सकते हैं। इसलिए, समाज और पूरे देश की समृद्धि और शान्ति के लिए नागरिक कर्तव्य बहुत अधिक मायने रखते हैं।
श्री नकवी ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के लिए जब उपयुक्त शासन प्रणाली के चयन का समय आया तो हमारे पूर्वजों ने संसदीय लोकतंत्र को चुनकर सरकार को अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह बनाने का काम किया I जवाबदेही का मूल संवैधानिक मंत्र है "मौलिक अधिकार एवं नागरिक कर्त्तव्य"। इस प्रणाली के अंतर्गत, विधानमंडल जन भावनाओं और सरोकार की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गए जिन्हें अपने निर्वाचकों की ओर से और उनके सभी प्रकार के हितों का प्रतिनिधित्व करते हुए सदस्यों द्वारा सभा के भीतर उठाया जाता है I इसके अलावा, प्रभावी कानून बनाने के लिए विधानमंडलों में जन प्रतिनिधियों द्वारा अपने समय, ऊर्जा, जानकारी और विचारों का योगदान किया जाना आवश्यक है I इसी संदर्भ में, विधायी कार्यों की ओर जन प्रतिनिधियों का ध्यान केंद्रित करना और उनकी क्षमता बढ़ाना संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है I
श्री नकवी ने कहा कि जैसा कि हम सब जानते हैं, आज के युग में नीति निर्माण की प्रक्रिया लगातार विकसित और वैज्ञानिक हो रही है और बदलती हुई सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए जन प्रतिनिधियों के लिए ये ज़रूरी है कि वे न केवल आम जनता की आवश्यकताओं की ओर ध्यान दें बल्कि लोगों से जुड़े विभिन्न समूहों-संगठनों से संपर्क-संवाद का क्रम मजबूत करें। चुने हुए प्रतिनिधि आम जनता और ऐसे समूहों की आशाएं तभी पूरी कर सकते हैं जब उनके पास विधायी कार्यों को प्रभावी तरीके से करने के लिए आवश्यक सभी जानकारियां और संसाधन उपलब्ध होंI जन प्रतिनिधियों को पर्याप्त जानकारी समय पर उपलब्ध कराने के महत्व के बारे में काफी कुछ कहा जा चुका है इसलिए आज हम इस मंच पर इस बारे में बात करते हैं कि उन्हें किस प्रकार पर्याप्त जानकारी समय पर उपलब्ध कराई जा सकती है I
श्री नकवी ने कहा कि विधायी प्रबोधन एक ऐसा महत्वपूर्ण तंत्र है जिसके माध्यम से विशेषकर पहली बार निर्वाचित जन प्रतिनिधि संसदीय प्रक्रियाओं और पद्धतियों से और परिपाटियों, शिष्टाचार तथा परम्पराओं सहित संस्था के कार्यकरण से परिचित होते हैं I इस संदर्भ में, मैं स्व. अरुण जेटली जी की बात दोहराना चाहूंगा कि,"राजनीति देश के जीवन पर असर डालती है इसलिए उन लोगों की क्षमता जो इस व्यवस्था को चलाते हैं, देश के द्वारा उन्हें सौंपी गई ज़िम्मेदारी के अनुरूप उत्कृष्ट होनी चाहिएI" प्रबोधन कार्यक्रम जन प्रतिनिधियों को जनता द्वारा उन्हें सौंपी गई इस ज़िम्मेदारी के बारे में जागरूक बनाते हैं I
श्री नकवी ने कहा कि इस संदर्भ में, ये उल्लेखनीय है कि लोक सभा में संसदीय लोकतंत्र शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान(प्राइड) संसद के नव निर्वाचित सदस्यों के लिए प्रबोधन कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक आयोजन कर रहा है I इन प्रबोधन कार्यक्रमों के दौरान, प्रख्यात सांसद, वरिष्ठ संसदीय अधिकारी और विशेषज्ञ नव-निर्वाचित सदस्यों के साथ हमारी संसदीय संस्थाओं के कार्यकरण के विभिन्न पहलुओं के बारे में चर्चा करते हैं I ये सत्र संवादपरक होते हैं और विषय विशेषज्ञ अपने अनुभवों तथा विचारों को साझा करते हैं और संसद सदस्य मुक्त रूप से उनके साथ विचार-विमर्श कर सकते हैं I

श्री नकवी ने कहा कि जैसा कि हम सब जानते हैं कि जन प्रतिनिधियों का मुख्य कार्य कानून बनाना है इसलिए उनमें यह क्षमता होनी चाहिए कि वे नीति से जुड़े मुद्दों की पहचान कर सकें, उस मुद्दे के समाधान के लिए संभावित विधायी विकल्प खोज सकें, उससे संबंधित हितधारकों के परामर्श के साथ उपलब्ध विकल्पों पर विचार-विमर्श करके सबसे उपयुक्त विकल्प का चुनाव कर सकें I इस प्रकार का आकलन और विचार-विमर्श तभी किया जा सकता है जब जन प्रतिनिधियों को प्रस्तावित विधानों के बारे में पूरी जानकारी दी गई हो I इस दिशा में, जन प्रतिनिधियों का ध्यान विधायी कार्यों की ओर बढ़ाने के लिए विधानमंडलों के विधायी कार्यों के बारे में जानकारी सत्र बहुत महत्व रखते हैं I
श्री नकवी ने कहा कि अब मैं माननीय पीठासीन अधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण विधायी कार्यों के संबंध में आयोजित जानकरी सत्रों के दौरान प्राप्त अपने अनुभव को साझा करना चाहूंगा, जिसे हमने हाल ही में लोकसभा में शुरू किया है। सभा के समक्ष उठाए जाने वाले विधायी मुद्दों के प्रति हमारे सदस्यों को और अधिक सजग बनाने के उद्देश्य से शुरू किए गए इन सत्रों ने प्रस्तावित विधायी विकल्पों से पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण कर सदस्यों को इनसे परिचित कराया है और मुझे इस बात का उल्लेख करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हमें हमारी इस पहल के बारे में सदस्यों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं।
श्री नकवी ने कहा कि कानून बनाने के अतिरिक्त कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी विधानमंडल का एक और प्रमुख कार्य है । भारत की संसद, विभागों से संबद्ध स्थायी समितियों के गठन के माध्यम से यह जवाबदेही सुनिश्चित करती है, जो अन्य कार्यों के साथ-साथ सरकार द्वारा किए जा रहे विभिन्न नीतियों के कार्यान्वयन की जाँच भी करती है ।
इन विधायी कार्यों को भली-भाँति पूरा करने के लिए यह आवश्यक है कि जनप्रतिनिधियों को क्षेत्र विशेष के लिए शोध सहायता उपलब्ध हो। कार्यपालिका से प्राप्त सूचना के साथ-साथ अतिरिक्त सूचनाओं को प्राप्त करने के लिए विधानमंडल की शोध सेवाओं का पूरा लाभ उठाया जाना चाहिए। समितियों में जागरूक जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति यह भी सुनिश्चित करती है कि नीति संबंधी बेहतर विधान पारित किए जाने के लिए विधानमंडल में प्रस्तुत किए जाएं जिससे कि इस लगातार विकसित हो रहे समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से संगत कानूनों के पारित किए जाने का मार्ग भी प्रशस्त हो सके।
श्री नकवी ने कहा कि यूएसए में कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) यू.एस. कांग्रेस के लिए विशेष रूप से काम करती है, पार्टी संबद्धता की परवाह किए बिना समितियों और दोनों सदन और सीनेट के सदस्यों को नीति और कानूनी विश्लेषण प्रदान करती है।
श्री नकवी ने कहा कि विभिन्न मुद्दों के संबंध में जनप्रतिनिधियों की सूचना संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक निष्पक्ष दृष्टिकोण के साथ सदस्यों को शोध सहायता प्रदान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस बात से आप भलीभाँति परिचित होंगे कि लोकसभा सचिवालय की ग्रंथालय और संदर्भ, शोध, प्रलेखन एवं सूचना सेवा सभी प्रकार की आधुनिक सुविधाओं से लैस ग्रंथालय उपलब्ध कराकर तथा अच्छी शोध और संदर्भ सेवाएं प्रदान करके संसद सदस्यों को विश्व भर में हो रहे घटनाक्रमों से अवगत कराती है । शोध प्रभाग दोनों सभाओं के समक्ष उठाए जाने वाले विधायी तथा अन्य मामलों के संबंध में विधायी और सूचना बुलेटिन प्रकाशित करता है ताकि सदस्य अपनी संबंधित सभाओं में होने वाले वाद-विवाद में प्रभावी रूप से भाग ले सकें।
श्री नकवी ने कहा कि भारत में विधानमंडलों ने पिछले सात दशकों से सामाजिक दृष्टि से संगत विभिन्न विधानों को अधिनियमित करके राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तथापि, भारत में संसदीय लोकतंत्र के सफल कार्यकरण में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रौद्योगिकीय विकास से जुड़ी विभिन्न चुनौतियां बाधा बनकर आती हैं, जिनसे तभी निपटा जा सकता है जब जनप्रतिनिधि विधायी महत्व से जुड़े विभिन्न मुद्दों के प्रति सजग और संवेदनशील हों तथा उनके पास इन मुद्दों से जुड़ी अद्यतन जानकारी उपलब्ध हो। विधायी कार्यों के निपटान में इस जानकारी का सटीक प्रयोग ही हमारी संसदीय संस्थाओं के सफल कार्यकरण में सहायक सिद्ध होगा।
श्री नकवी ने कहा कि अपने कार्यों पर ध्यान देने वाला जनप्रतिनिधि ही विधायी निकायों के कार्यकरण में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है और ऐसा करके, वह कार्यपालिका के कार्य करने के तरीके को भी बदल सकता है । मैं आशा करता हूं कि इस संगोष्ठी में हुए विचार-विमर्श सार्थक सिद्ध होंगे और हमारे पीठासीन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। मेरा विश्वास है कि इस विचार-विमर्श में भाग लेने वाले पीठासीन अधिकारी और जनप्रतिनिधि सभा में किए जाने वाले विधायी कार्यों के प्रति अधिक ध्यान देकर अपनी प्रभावकारिता को और बढ़ा सकते हैं।
श्री नकवी ने कहा कि सत्रहवीं लोकसभा जैसे परिदृश्य में, जहां संसद के 543 सदस्यों में से 267 सदस्य पहली बार सदस्य बने हैं, प्रभावी रूप से विधायी कार्यों में उनकी दीक्षा तथा क्षमता निर्माण पूर्ववर्ती के प्रभावी रूप से कार्य करने के लिए अनिवार्य हो जाता है। यही स्थिति विधानसभाओं में भी देखी गई है जहाँ हर बार 50 प्रतिशत से ज्यादा नए प्रतिनिधि निर्वाचित हो कर आते हैं।