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30 सितम्बर, 2015 को विशाखापट्नम में 17वें अखिल भारतीय सचेतक सम्मलेन के दौरान मेरे समापन भाषण की प्रेस विज्ञप्ति :

विशाखापट्नम, 30 सितम्बर, 2015: केंद्रीय संसदीय एवं अल्पसंख्यक मामलों के राज्यमंत्री श्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने आज कहा कि बदले हुए राजनैतिक माहौल में राज्यसभा-विधानपरिषदों की भूमिका को "रि-डिफाइन" करने की जरुरत है। विशाखापट्नम में 17वें अखिल भारतीय सचेतक सम्मलेन को सम्बोधित करते हुए श्री नक़वी ने कहा कि कभी-कभी जनादेश मिलने के बावजूद भी सरकारें और सदन राजनैतिक कारणों से देश और लोगों के सरोकार से जुड़े हुए कानून नहीं पास करा पाते हैं। श्री नक़वी ने कहा कि जिस समय संविधान निर्माताओं ने दोनों सदनों के अधिकारों-कर्तव्यों की कल्पना की थी, उस समय ऐसी राजनैतिक परिस्थितियों का अंदेशा ना रहा हो। श्री नक़वी ने कहा कि आज लोग 80-90 प्रतिशत मतदान कर यह अपेक्षा करते हैं कि सदन और सरकारें जनादेश का सम्मान और जन अपेक्षाओं पर खरी उतरेंगी। पर कभी-कभी जन सरोकार “सियासत की सूली” चढ़ जाता है और सरकारें व्यवस्था की बंधन बन जाती हैं। राज्यों में यह संकट कम देखने को मिलता है पर केंद्र को अक्सर इस तरह के संकट का सामना करना पड़ता है। श्री नक़वी ने कहा कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र ना केवल भारत बल्कि दुनिया की सबसे मजबूत संवैधानिक व्यवस्था है, 6 दशकों से ज्यादा समय से विभिन्न कमियों, कमजोरियों और चुनौतियों के बावजूद भारत का संसदीय लोकतंत्र मजबूत और प्रभावी हुआ है। श्री नक़वी ने कहा कि संसद और विधानसभाओं के चुनावों में आतंकवाद, माओवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद की चुनौतियों के बावजूद कश्मीर से कन्याकुमारी तक लोगों की बढ़-चढ़ कर भागीदारी भारत के लोगों की संसदीय लोकतंत्र के प्रति अटूट आस्था और विश्वास का प्रमाण है। हमारे कन्धों पर लोगों की आस्था और विश्वास को मजबूत करने, बनाये रखने की बड़ी जिम्मेदारी है, लोकतान्त्रिक, संवैधानिक,संसदीय मूल्यों की रक्षा हमारा धर्म है। श्री नक़वी ने कहा कि भारत की संसदीय व्यवस्था दुनिया के सभी लोकतान्त्रिक देशों को प्रेरणा देती रही है। श्री नक़वी ने कहा कि संसद और राज्यों के विधानमंडल आम जनता के हितों की संरक्षक हैं, आम लोगों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने, उनके समाधान का सबसे असरदार संवैधानिक मंच हैं। आम जनता की संसद और राज्य विधानमंडलों से, उनके जन प्रतिनिधियों से बहुत अपेक्षाएं हैं, यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि जनता की उम्मीदों,आकाँक्षाओं की पूर्ति के किये काम करें। श्री नक़वी ने कहा कि संसद और राज्यों के विधानमंडल को लेकर आम लोगों के बीच बढ़ रही नकारात्मक भावना चिंता का विषय है, बेवजह के हंगामे से राजनीतिज्ञों को लेकर लोगों के मन में एक प्रकार की निराशा का माहौल बनता है। डिस्कशन, डिबेट और डिस्टर्बेंस को संसदीय व्यवस्था का भाग बताते हुए। श्री नक़वी ने कहा कि, विपक्ष एक सजग प्रहरी की तरह है जो सरकार पर कड़ी नजर रखता है ताकि सरकार लोगों के हितों की अवहेलना ना कर सके। सरकार द्वारा आम जनता के हितों को नजरअंदाज किये जाने पर विपक्ष को अपनी आवाज उठाने का पूरा हक है। लेकिन हंगामा मुद्दों पर आधारित होना चाहिए, विपक्ष को एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए ना कि अवरोधकारी विपक्ष की। श्री नक़वी ने कहा कि आधारहीन मुद्दों पर हंगामा न केवल संसद और राज्यों के विधानमंडलों की साख पर प्रभाव डालता है बल्कि इससे जनता का पैसा भी बर्बाद होता है। इस स्थिति से बचने की जरुरत है। श्री नक़वी ने कहा कि संसद के पिछले मानसून सत्र के दौरान हमने देखा कि आधारहीन हंगामे से देश की आर्थिक प्रगति से जुड़े कुछ अत्यंत जरुरी बिल पारित नहीं किये जा सके। हमें यह समझना होगा कि देश की जनता हमें इसलिए चुन कर संसद या विधानमंडलों में भेजती है ताकि हम "विकास की रोड बनें, रोड़ा न बनें।" हमें संसद और राज्यों के विधानमंडलों की अधिक से अधिक बैठकें सुनिश्चित करनी होंगी।हमारी केंद्र की सरकार इस दिशा में काम कर रही है। संसद-विधानसभाओं का हर मिनट देश और लोगों के सरोकार को समर्पित होना चाहिए। श्री नक़वी ने कहा कि संसद और विधानमंडलों में कभी-कभी कुछ सदस्यों का अशोभनीय, गैर जिम्मेदाराना व्यव्हार भी चिंता का विषय है। सदस्यों के अशोभनीय व्यवहार से न केवल संसद या विधानमंडलों का काम काज प्रभावित होता है बल्कि इन संस्थाओं की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है। अब समय आ गया है हम इन विषयों पर गहन चिंतन करें। हमारे बीच वैचारिक, सैद्धांतिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन इन मतभेदों को देश की तरक्की के रास्ते में रोड़ा बनने से रोकना हम सभी की जिम्मेदारी है। वैचारिक,सैद्धांतिक मतभेदों को राजनैतिक मनभेद में नहीं बदलना चाहिए। इस परिस्थिति में मुख्य सचेतकों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है।