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  • 9 अगस्त 2015

    ''तर्कहीन तमाशा''- संसद का ''गूंगा गुड्डा'' ''सड़क का सुरमा'' बनने चला

     संसद का ''गूंगा गुड्डा'', ''सड़क का सुरमा'' बनने की कोशिश में घर (संसद) का न घाट (सड़क) का की स्थिति में आ गया है। संसद और सड़क की सियासत जन सरोकार और देश के विकास के मुद्दों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई होती है। पर संसदीय लोकतंत्र का यह पहला मौक़ा है जब ''ग्रैंड ओल्ड पार्टी'' के ''ब्रैंड न्यू लीडर'' न सड़क की हक़ीक़त समझ पा रहे हैं, न संसद का महत्व। ''ग्रैंड ओल्ड पार्टी'' के ''ब्रैंड न्यू लीडर'' राहुल बाबा का ''नॉनसेंस से न्यूसेंस'' तक का राजनैतिक सफर संसदीय सोच और सड़क की समझ से कोसों दूर है।

    विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र भारत में, संसद, लोगों से सम्बंधित मुद्दों, उनकी चिंताओं एवं आकांक्षाओं को व्यक्त करने और इनके समाधान की सर्वोच्च एवं सबसे असरदार संस्था है। हमारे भारतीय प्रजातंत्र में जायज़ मुद्दों पर संसद में हंगामा भी प्रजातंत्र का एक स्वीकार्य भाग है, बशर्ते ये व्यवधान-विरोध मुद्दों पर आधारित, तार्किक एवं जनता के हित में हो, या सरकार यदि जन सरोकार की अनदेखी कर रही हो तो विपक्ष को अपनी आवाज़ बुलंद करने का लोकतान्त्रिक अधिकार है।

    लेकिन हमने संसद के मानसून सत्र, जो कि 21 जुलाई, 2015 को प्रारम्भ हुआ, में कांग्रेस द्वारा  आधारहीन हंगामा और अवरोध देखा है जो उपरोक्त लोकतान्त्रिक सिद्धांतों के विपरीत है। संसद के दोनों सदनों में कार्यवाही को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ने बिना किसी तर्क के बाधित किया है, जबकि सरकार सभी मुद्दों पर चर्चा और उसके समाधान की बात बार-बार दुहराती रही, बातचीत -बहस  के लिए कांग्रेस से बराबर विनती करती रही किन्तु कांग्रेस अपने असहयोगात्मक एवं अहंकारी रुख पर कायम रही।

    प्रजातंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है, लेकिन इस मानसून सत्र के दौरान कांग्रेस ने जो ''व्यवधानकारी और नाकारात्मक'' रणनीति अपनाई है, उसे किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता। कांग्रेस ने लोकतंत्र के मंदिर को अपनी संकीर्ण मानसिकता के चलते हंगामे का अखाड़ा बना दिया। कांग्रेस, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के विकास को समर्पित प्रयासों में बाधा डाल कर जनादेश का अपमान कर रही है।

    हम मानते हैं कि संसद को सुचारू रूप से चलाने की सबसे अधिक जिम्मेदारी सरकार की होती है और हमारी सरकार ने अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। मानसून सत्र का एजेंडा तय करने के लिए सरकार ने 20 जुलाई 2015 को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमे लगभग 30 राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे और कांग्रेस सहित सभी दल, सभी प्रमुख मुद्दों पर व्यापक चर्चा के पक्ष में थे। कांग्रेस ने भी कहा की वह व्यापम और ललित मोदी की यात्रा दस्तावेज़ से सम्बंधित मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है और उसे सरकार से संतोषजनक जवाब चाहिए। सरकार चर्चा के लिए तैयार थी, लेकिन कांग्रेस ने U-टर्न  लेते हुए दोनों सदनों की कार्यवाही को पहले ही दिन से बाधित किया है। राज्यसभा में कांग्रेस अपने कुछ साथियों के साथ अपने संख्याबल का दुरुपयोग करते हुए पूरे सत्र को हंगामे की भेंट चढ़ा रही है।

    21 जुलाई की सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे तथा उन्होंने सलाह दी कि सभी मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए, क्योंकि संसद लोगों की चिंता और आकांक्षाओं को प्रदर्शित करने के लिए सबसे प्रभावशाली मंच है और उन्होंने सभी दलों का इसमें सहयोग मांगा राज्यसभा में सदन के नेता और वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने विभिन्न दलों के नेताओं से उनके मुद्दों के बारे में मिलकर बात करनी चाही लेकिन कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं थी।

    संसदीय कार्य मंत्री श्री वेंकैया नायडू 31 जुलाई 2015 को सर्वदलीय बैठक बुलाने को इच्छुक थे, लेकिन लेकिन कांग्रेस ने कहा कि उसे किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में शामिल होना है इसलिए वो शामिल नहीं हो सकते।

    इन सभी बातों से यह स्पष्ट होता है कि हमारी सरकार द्वारा मानसून सत्र के आरम्भ से ही संसद में गतिरोध को दूर करने के लिए कई प्रयास किये गए। संसद में जन सरोकार और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर बहस और क़ानून बनाने की जिम्मेदारी विपक्ष की भी होती है, लेकिन कांग्रेस पूरे मानसून सत्र को बर्बाद होते हुए देखना चाहती है। यह उसका नाकारात्मक संकल्प है। इसी संकल्प को पूरा करने के लिए कांग्रेस हंगामे की हद तक पहुँच गई है।

    कांग्रेस तिल को ताड़ बनाकर विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का इस्तीफा मांग रही है। श्रीमती स्वराज द्वारा अपना पक्ष साफ़-साफ़ रखने के बाद भी कांग्रेस इस मामले को छोड़ने को तैयार नहीं है,  इससे साबित होता है कि कांग्रेस पूरी तरह से ''राजनैतिक दिवालिया पार्टी'' बन गई है। कांग्रेस की रणनीति ने स्पष्ट कर दिया है कि वह चर्चा नहीं सिर्फ चकल्लस और चिक-चिक चाहती है।श्रीमती सोनिया गांधी, श्री राहुल गांधी के हालिया बयान संसदीय मर्यादा और राजनैतिक शालीनता को तार-तार करने वाले रहे हैं।

    इसका मुख्य कारण यह है कि कांग्रेस पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में अपनी करारी शिकस्त और तीन दशकों के बाद श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में NDA को मिला पूर्ण बहुमत अभी तक पचा नहीं पाई है। देश के लोगों को भी अब ये बात भली-भांति समझ आ गई है कि भारत के पुनरुथान के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृतव वाली NDA सरकार के प्रयासों में बाधा डालने के लिए कांग्रेस ऐसा कर रही है। कुछ ‘’सामंती मानसिकता’’ के लोग श्री नरेंद्र मोदी के नेतृतव में गरीबों के विकास के लिए बढ़ते कदम हज़म नहीं कर पा रहे हैं।

    कुल 9 बिल इस सत्र में इंट्रोडक्शन के लिए निर्धारित थे, 8 बिल जो की राज्यसभा में पेंडिंग हैं, पारित किये जाने थे। इनमे दो अत्यंत महत्वपूर्ण बिल GST, रियल एस्टेट (रेगुलेशन एवं डेवलपमेंट) बिल, 2013 भी हैं जो देश की द्रुत गति से आर्थिक विकास के लिए जरुरी हैं, साथ ही जो देश की विकास यात्रा को तेज गति प्रदान करने में काफी मददगार भी साबित होंगें।

    राज्यसभा में हंगामे के कारण कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयक जैसे जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन) संशोधन बिल, 2015, प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन (संशोधन) बिल, 2013, विस्सल ब्लोवेर्स प्रोटेक्शन (संशोधन) बिल, 2015,  चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) संशोधन बिल, 2012 विचार एवं पारित किये जाने के लिए निर्धारित थे, लेकिन ये विधेयक हंगामे की भेंट चढ़ गए हैं।

    राज्यसभा में अपने संख्या बल का दुरुपयोग कर कांग्रेस, सरकार द्वारा प्रस्तावित प्रमुख सुधारों के रास्ते में रोड़ा अटकाने का काम कर रही है। यह सुधार किसी राजनैतिक दल का नहीं बल्कि देश के गरीब, किसान, मजदूर, नौजवान और आम लोगों से जुड़ा हुआ है।

     ऐसे में यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस सिर्फ और सिर्फ अपने निहित राजनैतिक लाभ के लिए संसद की कार्यवाही को बाधित कर रही है, जबकि उसे यह समझना चाहिए कि वह ऐसा कर देश के विकास को भी बाधित कर रही है। इसके लिए कांग्रेस को बड़ी कीमत चुकानी होगी क्योंकि देश के लोग सब देख और समझ रहे हैं और ऐसी नाकारात्मक नीति का सूद-ब्याज के साथ हिसाब-किताब करेंगें। कांग्रेस की रस्सी जल चुकी है, बल नहीं गया, आने वाले दिनों में लोग बल भी ठीक कर देंगें।

    NDA की सरकार द्वारा विपक्ष की भावनाओं को पूरा-पूरा अवसर देने के कारण ही पिछले संसद सत्र में उच्च उत्पादकता हासिल की गई। बजट सत्र में तो लोकसभा ने निर्धारित समय का 117 प्रतिशत और राज्यसभा ने 101 प्रतिशत कार्य किया। लेकिन कांग्रेस के हंगामे के कारण 21 जुलाई से 7 अगस्त तक  राज्यसभा के लगभग 57 घंटे बर्बाद हुए,जबकि लोकसभा में 21 जुलाई  से 4 अगस्त तक  लगभग  27 घंटे बर्बाद हुए। इसके अलावा जनता का करोड़ों रुपया भी बर्बाद हुआ। इन सबके लिए केवल कांग्रेस का अहंकार-अराजकता ही जिम्मेदार है।

    कांग्रेस का यह कहना कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब उसने भी संसद की कार्यवाही को बाधित किया था अपने आप में हास्यास्पद है। यह सर्वविदित है की भाजपा ने 2G,कोयला आवंटन, तथा अन्य घोटालों से सम्बंधित विषयों को पूरी गंभीरता से संसद से ले कर सड़क तक उठाया था। अदालतों ने भी इन मामलों में संज्ञान लिया था, CAG की रिपोर्टों में गड़बड़ियों को उजागर किया गया था। यह सभी मुद्दें जन धन की खुली लूट से जुड़े थे जिसे कोर्ट, CAG सभी ने स्वीकार किया था। 1 लाख 76 हज़ार करोड़ रूपए का 2G घोटाला, 1 लाख 86 हज़ार करोड़ का कोयला घोटाला, 70 हज़ार करोड़ का कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला हुआ था। इन घोटालों को लेकर भाजपा ने JPC बनाने की मांग को लेकर आवाज उठाई थी।

     कांग्रेस ने इस सत्र में लोकसभा स्पीकर की अवमानना सहित अन्य सभी नियम कानून को तोड़ा है, जिसके चलते 3 अगस्त, 2015  को स्पीकर श्रीमती सुमित्रा महाजन को 25 कांग्रेस सदस्यों को 5 दिन के लिए सस्पेंड करना पड़ा क्योंकि इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था, कांग्रेस के सदस्य संसद को बाधित करने की अपनी नाकारात्मक जिद छोड़ने को तैयार नहीं थे।

    इससे पहले भी कई बार विभिन्न कारणों से संसद के सदस्य निलंबित हुए हैं। 15 मार्च, 1989 को 63 सदस्यों को पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से सम्बंधित जस्टिस ठक्कर की रिपोर्ट को लेकर निलंबित कर दिया गया था। 23 अगस्त 2013 को UPA की सरकार के दौरान स्पीकर श्रीमती मीरा कुमार ने 4 टीडीपी और 8 खुद कांग्रेस के ही सदस्यों को हंगामा करने के कारण निलंबित कर दिया था। 2 सितम्बर 2013 को उन्होंने टीडीपी के 4 और कांग्रेस के 5 सदस्यों को निलंबित कर दिया था। कोई भी स्पीकर या चेयरमैन संसद सदस्यों का निलंबन मज़बूरी और भारी मन से करता है।

    राजनीति और विकास को साथ-साथ चलना चाहिए। कांग्रेस व्यवधानकारी एवं विनाशकारी नीति अपनाकर प्रजातंत्र के लिए अच्छा उदाहरण पेश नहीं कर रही है। यह उसके राजनैतिक सेहत के लिए भी ठीक नहीं है। गतिरोध की राजनीति से किसी का फायदा नहीं होगा। हमारी सरकार का संकल्प है कि व्यवधान विकास के रास्ते का रोड़ा ना बने।

    ऐसा लगने लगा है कि सत्ता के गलियारे से बेदखल किये गए सत्ता के दलालों-बिचौलियों ने देश के विकास की धारा को रोकने के लिए कांग्रेस को 'सुपारी' दे रखी है,  कांग्रेस का बेबुनियाद, तर्कहीन हंगामा तो यही साबित करता है।